Category Archives: Shocking Facts

Before You Do “SUICIDE” You must see the life’s Struggle & Challenges of Nicholas James…!!!

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Nicholas James “Nick” Vujicic is born 4 December 1982) is an Australian Christian evangelist and motivational speaker born with tetra-amelia syndrome, a rare disorder characterised by the absence of all four limbs.

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As a child, he struggled mentally and emotionally as well as physically, but eventually came to terms with his disability and, at the age of seventeen, started his own non-profit organisation, Life Without Limbs. Vujicic presents motivational speeches worldwide which focus on life with a disability, hope and finding meaning in life.

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 He also speaks about his belief that God can use any willing heart to do his work and that God is big enough to overcome any disability.

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During secondary school, Vujicic was elected captain of Runcorn State High School in Queensland and worked with the student council on fundraising events for local charities and disability campaigns.

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When he was seventeen, he started to give talks at his prayer group and later founded his non-profit organisation, Life Without Limbs.

Vujicic graduated from Griffith University at the age of 21 with a Bachelor of Commerce, with a double major in accountancy and financial planning. Subsequently he became a motivational speaker, travelling internationally and focusing on teenagers’ issues. Having addressed over three million people in over 44 countries on five continents, he speaks to corporate audiences, congregations and schools.

Vujicic promotes his work through television shows and through his writing. His first book, Life Without Limits: Inspiration for a Ridiculously Good Life (Random House, 2010) was published in 2010. He markets a motivational DVD, Life’s Greater Purpose, a short documentary filmed in 2005 highlighting his home life and regular activities. The second part of the DVD was filmed at his local church in Brisbane – one of his first professional motivational speeches. He markets a DVD for young people titled No Arms, No Legs, No Worries!

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Vujicic has written that he keeps a pair of shoes in his closet due to his belief in miracles.
In 2005 Vujicic was nominated for the Young Australian of the Year Award.

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On February 2012, he married the girl of his dreams”kanae miyahara” And now they have a beautiful blessed baby.

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Please visit Below links of Nicholas James:

http://www.lifewithoutlimbs.org/

Attitude is Attitude

http://www.attitudeisaltitude.com/

Video interview of Nick Vujicic.

http://www.cbn.com/tv/1430455394001

http://photography.ratishnaroor.com/nick-vujicic-pictures-salt-lake-city-utah/

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Information sources: Wikipedia 

Images sources: Moody Photography

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इंडिया के टॉप हॉन्टेड प्लेस में है शामिल शनिवार वाडा फोर्ट (Shaniwar wada fort – one of the most haunted place of India)

शनिवार वाडा फोर्ट, महाराष्ट्र के पुणे में स्तिथ है। इस किले की नीव शनिवार के दिन रखी गई थी इसलिए इसका नाम शनिवार वाडा पड़ा। यह फोर्ट अपनी भव्यता और ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है।  इसका निर्माण 18 वि शताब्दी में  मराठा साम्राज्य पर शासन करने वाले पेशवाओं ने करवाया था। यह किला 1818 तक पेशवाओं की प्रमुख गद्दी रहा था।  लेकिन इस किले के साथ एक काला अध्याय भी जुड़ा है। इस किले में 30 अगस्त 1773 की रात को 18 साल के  नारायण राव, जो की मात्र 16 साल की उम्र में मराठा साम्राज्य के पांचवे पेशवा बन थे, की षड्यंत्रपूर्वक ह्त्या कर दी गई थी। जब हत्यारे उसकी ह्त्या करने आये तो उसने ख़तरा भांप कर अपने काका (चाचा)  कक्ष की और “Kaka Mall Vachva” (Uncle Save Me) कहते हुए दौड़ लगाई पर बदकिस्मती  वहाँ पहुंचने से पहले मारा गया।  कहते है की किले में उसी बच्चे नारायण राव की आत्मा आज भी भटकती है और उसके द्वारा बोले गए आखिरी शब्द “काका माला वचाव” आज भी किले में सुनाई देते है। इसलिए इस किले को इंडिया के टॉप मोस्ट हॉन्टेड प्लेस  (Top most haunted place of India) में शामिल किया जाता है। आइये अब हम आपको इस किले के निर्माण से लेकर इस पर अंग्रेजो के अधिकार तक तथा नारायण राव की षड्यंत्रपूर्वक ह्त्या पर विस्तार से बताते है।

शनिवार वाडा फोर्ट (Image credit TripAdvisor)
शनिवार वाडा फोर्ट (Image credit TripAdvisor)

शनिवार वाडा फोर्ट का निर्माण :
इस किले की नींव पेशवा बाजीराव प्रथम ने 10 जनवरी 1730, शनिवार को रखी थी। इस किले का उदघाटन 22 जनवरी 1732 को किया गया था। हालांकि इसके बाद भी किले के अंदर कई इमारते और एक लोटस फाउंटेन का निर्माण हुआ था। शनिवार वाडा फोर्ट का निर्माण राजस्थान के ठेकेदारो ने किया था जिन्हे की काम पूर्ण होने के बाद पेशवा ने नाईक (Naik) की उपाधि से नवाज़ा था। इस किले में लगी टीक की लकड़ी जुन्नार (Junnar) के  जंगलो से, पत्थर चिंचवाड़ (Chinchwad) की खदानों से तथा चुना जेजुरी (Jejuri) की खदानों से लाया गया था। इस महल में 27 फ़रवरी 1828 को अज्ञात कारणों से भयंकर आग लगी थी।  आग को पूरी तरह बुझाने में सात दिन लग गए थे। इस से किले परिसर में बनी कई इमारते पूरी तरह नष्ट हो गई थी। उनके अब केवल अवशेष बचे है।  अब यदि हम इस किले की संरचना की बात करे तो किले में प्रवेश करने के लिए पांच दरवाज़े है।

शनिवार वाडा फोर्ट (Image credit TripAdvisor)
शनिवार वाडा फोर्ट (Image credit TripAdvisor)

1 . दिल्ली दरवाज़ा  Dilli Darwaza (Delhi Gate) :
यह इस किले का सबसे प्रमुख गेट है जो  उत्तर दिशा  दिल्ली  तरफ खुलता है इसलिए इसे दिल्ली दरवाज़ा कहते है। यह इतना ऊँचा और चौड़ा की है पालकी सहित हाथी आराम से आ जा सकते है। हमले के वक़्त हाथियों से इस गेट को बचाने लिए इस गेट के दोनों पलड़ो में 12 इंच लम्बे 72 नुकीले कीले लगे हुए है जो कि हाथी के माथे तक की ऊँचाई पर है। दरवाज़े के दाहिने पलड़े में एक छोटा सा गेट और है जो की सैनिको के आने जाने के काम आता था।

दिल्ली दरवाज़ा  Dilli Darwaza (Delhi Gate)  image credit: wikipedia
दिल्ली दरवाज़ा Dilli Darwaza (Delhi Gate) image credit: wikipedia

2. मस्तानी दरवाज़ा  Mastani Darwaja (Mastani’s Gate) or Aliibahadur Darwaja  :
यह दरवाज़ा दक्षिण दिशा की और खुलता है। बाजीराव  की पत्नी मस्तानी जब किले से बाहर जाती तो इस दरवाज़े का उपयोग करती थी।  इसलिए इसका नाम मस्तानी दरवाज़ा है। वैसे इसका एक और नाम अली बहादुर दरवाज़ा भी है।

3. खिड़की दरवाज़ा  Khidki Darwaja (Window Gate) :
यह दरवाज़ा पूर्व दिशा में खुलता है। इस दरवाज़े में खिड़की बनी हुई है इसलिए इसे खिड़की दरवाज़ा कहते है।

4. गणेश दरवाज़ा Ganesh Darwaja (Ganesh Gate) :
यह दरवाज़ा दक्षिण – पूर्व दिशा में खुलता है।  यह दरवाज़ा किला परिसर में स्थित गणेश रंग महल के पास स्थित है इसलिए इसे गणेश दरवाज़ा कहते है।

5. जंभूल दरवाज़ा या नारायण दरवाज़ा Jambhul Darwaja or Narayan Darwaja (Narayan’s Gate) :
ये दरवाज़ा दक्षिण दिशा में खुलता है। ये दरवाज़ा मुख्यतः दासियों के महल आने जाने के काम आता था। नारायण राव पेशवा की ह्त्या के बाद उसकी लाश के टुकड़ो को इसी रास्ते से किले के बाहर ले जाया गया था इसलिए इसे नारायण दरवाज़ा भी कहा जाता है।

Shaniwar Wada palace Narayan's Gate           Image Credit Wikipedia
Shaniwar Wada palace Narayan’s Gate Image Credit Wikipedia

अब यदि किले के अंदर की इमारतों की बात करे तो इस किले में मुख्यतः तीन महल थे और तीनो ही 1828 में लगी आग में नष्ट हो गए। अब केवल उनके अवशेष है। इसके अलावा किले में एक 7 मंजिला ऊंची इमारत भी थी जिसकी सबसे ऊंची चोटी से 17 किलो मीटर दूर, आलंदी में स्थ्ति संत ज्ञानेश्वर के मंदिर का शिखर दिखाई देता था। यह इमारत भी आग में नष्ट हो गई थी। अब किले में कुछ छोटी इमारते ही सही सलामत है।

Shaniwar Wada palace walls and ruins below     Image Credit Wikipedia
Shaniwar Wada palace walls and ruins below Image Credit Wikipedia

लोटस फाउंटेन (Lotus Fountain) :
इस किले मुख्य आकर्षण कमल की आकार का एक फाउंटेन (फव्वारा) है। जिसे की हज़ारी करंजे कहते है। लेकिन इस फाउंटेन से भी एक दुखद इतिहास जुड़ा है। इसमें गिरकर घायल होने से एक राजकुमार की मृत्यु हो गई थी।

Shaniwar Wada palace Lotus fountain      Image Credit Wikipedia
Shaniwar Wada palace Lotus fountain Image Credit Wikipedia

जुन 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सर जॉन मैलकम को यह गद्दी सौप दी और इस तरह पेशवाओ की शान रहे इस किले पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया।

नारायण राव की हत्या :
पेशवा नाना साहेब के तीन पुत्र थे विशव राव, महादेव राव और नारायण राव।  सबसे बड़े पुत्र विशव राव पानीपत की तीसरी लड़ाई में मारे गए थे। नाना साहेब की मृत्यु के उपरान्त महादेव राव को गद्दी पर बैठाया गया। पानीपत की तीसरी  लड़ाई में महादेव राव पर ही रणनीति बनाने की पूरी जिम्मेदारी थी लेकिन उनकी बनाई हुई कुछ रणनीतियां बुरी तरह विफल रही थी फलस्वरूप इस युद्ध में मराठों की बुरी तरह हार हुई थी।  कहते है की इस युद्ध में मराठो के 70000 सैनिक मारे गए थे।  महादेव राव युद्ध में अपनी भाई की मृत्यु और मराठो की हार के लिए खुद को जिम्मेदार मानते थे।  जिसके कारण वो बहुत ज्यादा तनाव में रहते थे और इसी कारण गद्दी पर बैठने के कुछ दिनों बाद ही उनकी बिमारी से मृत्यु हो गई।

उनकी मृत्यु के पश्चात मात्र 16 साल की उम्र में नारायण राव पेशवा बने।  नाना साहेब के एक छोटे भाई रघुनाथ राव भी थे जिन्हे की सब राघोबा कहते थे। नारायण राव को पेशवा बनाने से काका (चाचा) राघोबा और काकी (चाची) अनादीबाई खुश नहीं थे। वो खुद पेशवा बनना चाहते थे उनको एक बालक का पेशवा बनना पसंद नहीं आ रहा था। दूसरी तरफ नारायण राव भी अपने काका को ख़ास पसंद नहीं करते थे क्योकि उन्हें लगता था की उनके काका ने एक बार उनके बड़े भाई महादेव राव की ह्त्या का प्रयास किया था।  इस तरह दोनों एक दूसरे को शक की नज़र से देखते थे।  हालात तब और भी विकट हो गए जब दोनों के सलाहकारों ने दोनों को एक दूसरे के विरुद्ध भड़काया। इसका परिणाम यह हुआ की नारायण राव ने अपने काका को घर में ही नज़रबंद करवा दिया।

इससे अनादि बाई और भी ज्यादा नाराज़ हो गई।  उधर राघोबा ने नारायण राव को काबू में करने का एक उपाय सोचा।  उनके साम्राज्य में ही भीलों का एक शिकारी कबीला रहता था जो की गार्दी (Gardi) कहलाते थे।  वो बहुत ही मारक लड़ाके थे। नारायण राव के साथ उनके सम्बन्ध खराब थे लेकिन राघोबा को वो पसंद करते थे।  इसी का फायदा उठाते हुए राघोबा ने उनके मुखिया सुमेर सिंह गार्दी को एक पत्र भेजा जिसमे उन्होंने लिखा ‘नारायण राव ला धारा’ जिसका मतलब था नारायण राव को बंदी बनाओ। लेकिन अनादि बाई को यहाँ एक खूबसूरत मौक़ा नज़र आया और उसने पत्र का एक अक्षर बदल दिया और कर दिया ‘नारायण राव ला मारा’  जिसका मतलब था नारायण राव को मार दो।

पत्र मिलते ही गार्दियों के एक समूह ने रात को घात लगाकर महल पर हमला कर दिया। वो रास्ते की हर बाधा को हटाते हुए नारायण राव के कक्ष की और बढे। जब नारायण राव ने देखा की गार्दी हथियार लेकर खून बहाते हुए उसकी तरफ आ रहे है तो वो अपनी जान बचाने के लिए अपने काका के कक्ष की और “काका माला वचाव” (काका मुझे बचाओ) कहते हुए भागा।  लेकिन वह पहुँचने से पहले ही वो पकड़ा गया और उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए गए।

यहाँ पर इतिहासकारो में थोड़ा सा मतभेद है कुछ उस बात का समर्थन करते है जो की हमने ऊपर लिखी जबकि कुछ का कहना है की नारायण राव अपने काका के सामने अपनी जान बचाने की गुहार करता रहा पर उसके काका ने कुछ नहीं किया और गार्दी ने राघोबा की आँखों के सामने उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। लाश के टुकड़ो को बर्तन में भरकर रात को ही महल से बाहर ले जाकर नदी में बहा दिया गया।

कहते है की किले में उसी बच्चे नारायण राव की आत्मा आज भी भटकती है और उसके द्वारा बोले गए आखिरी शब्द “काका माला वचाव” आज भी किले में सुनाई देते है।

रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा…!!! हॉन्टेड विलेज “कुलधरा”(HAUNTED VILLAGE KULDHARA) – एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान.

BHANGARH FORT – ALWAR – THE MOST HAUNTED PLACE OF INDIA (भानगढ़ का किला – अलवर – यह है भारत का मोस्ट हॉन्टेड किला )

SON DOONG CAVE – दुनिया की सबसे बड़ी गुफा (WORLD’S BIGGEST CAVE)

एक अति महत्वपूर्ण अहम सुचना जन हित मैं जारी…!!!

(  मोबाइल फोन )
( मोबाइल फोन )

मोबाइल से जुडी कई ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में हमें जानकारी नहीं होती..लेकिन मुसीबत के वक्त यह मददगार साबित होती है ।

इमरजेंसी नंबर – दुनिया भर में मोबाइल का इमरजेंसी नंबर 112 है ।…

अगर आप मोबाइल की कवरेज एरिया से बाहर हैं,तो 112 नंबर द्वारा आप उस क्षेत्र के नेटवर्क को सर्च कर लें..

ख़ास बात यह है कि यह नंबर तब भी काम करता है जब आपका कीपैड लौक हो !

मोबाइल चोरी होने पर-मोबाइल फोन चोरी होने की स्थिति में सबसे पहले जरूरत होती है ,

फोन को निष्क्रिय करने की ताकि चोर उसका दुरुपयोग न कर सके।

अपने फोन के सीरियल नंबर को चेक करने के लिए *#06# दबाएँ. इसे दबाते हीं आपकी स्क्रीन पर 15 डिजिट का कोड नंबर आयेगा. इसे नोट कर लें और किसी सुरक्षित स्थान पर रखें.

जब आपका फोन खो जाए उस दौरान अपने सर्विस प्रोवाइडर को ये कोड देंगे तो वह आपके हैण्ड सेट को ब्लोक कर देगा !

कार की चाभी खोने पर -अगर आपकी कार की रिमोट केलेस इंट्री है और गलती से आपकी चाभी कार में बंद रह गयी है और दूसरी चाभी घर पर है तो आपका मोबाइल काम आ सकता है !

घर में किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन पर कॉल करें !

घर में बैठे व्यक्ति से कहें कि वह अपने मोबाइल को होल्ड रखकर कार की चाभी के पास ले जाएँ और चाभी के अनलॉक बटन को दबाये साथ ही आप अपने मोबाइल फोन को कार के दरवाजे के पास रखें, दरवाजा खुल जायेगा…!!!

है न विचित्र किन्तु सत्य…!!!

है क्या ये..!!! आप कल्पना नही कर पाएँगे…!!! NO ONE BELIEVE…!!!

રહસ્યમય ઈશ્વરીય સર્જન તાકાતવર ઍનાકોન્ડાની દુર્લભ તસ્વીર…!!!

रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा…!!! हॉन्टेड विलेज “कुलधरा”(Haunted Village Kuldhara) – एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान.

हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा(Kuldhara) गाँव कि, यह गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं।कुलधरा(Kuldhara) गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे  और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं।

कुलधरा मे एक मकान
कुलधरा मे एक मकान

तब्दील हो चुका है| टूरिस्ट प्लेस में बदल चुके कुलधरा गांव घूमने आने वालों के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि कोई आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें आती हैं, महिलाओं के बात करने उनकी चूडिय़ों और पायलों की आवाज हमेशा ही वहां के माहौल को भयावह बनाते हैं। प्रशासन ने इस गांव की सरहद पर एक फाटक बनवा दिया है जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने की कोई हिम्मत नहीं करता हैं।

BHANGARH FORT – ALWAR – THE MOST HAUNTED PLACE OF INDIA (भानगढ़ का किला – अलवर – यह है भारत का मोस्ट हॉन्टेड किला )

वीरान कुलधरा गाँव
वीरान कुलधरा गाँव

वैज्ञानिक तरीके से हुआ था गाँव का निर्माण
कुलधरा(Kuldhara) जैसलमेर से लगभग अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है । पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और यह उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल ब्राम्‍हणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था। कुलधरा गाँव पूर्ण रूप से वैज्ञानिक तौर पर बना था। ईट पत्थर से बने इस गांव की बनावट ऐसी थी कि यहां कभी गर्मी का अहसास नहीं होता था। कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्‍तान में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । इस जगह गर्मियों में तापमान 45 डिग्री रहता हैं पर आप यदि अब भी भरी गर्मी में इन वीरान पडे मकानो में जायेंगे तो आपको शीतलता का अनुभव होगा। गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी । घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं ।

कुलधरा  मे 170 साल पुराना मकान
कुलधरा मे 170 साल पुराना मकान

पालीवाल ब्राम्‍हण होते हुए भी बहुत ही उद्यमी समुदाय था । अपनी बुद्धिमत्‍ता, अपने कौशल और अटूट परिश्रम के रहते पालीवालों ने धरती पर सोना उगाया था । हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्‍तानी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की परिकल्‍पना की थी । रेगिस्‍तान में खेती । पालीवालों के समृद्धि का रहस्‍य था । जिप्‍सम की परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना । पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्‍की कर पाए थे ।
पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था । और बड़ी शान से जीता था । जिप्‍सम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल खेती करते । और ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्‍त फसल पैदा करते । पालीवालों के जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार रेगिस्‍तान को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्‍तान बनाया । पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था ।

है क्या ये..!!! आप कल्पना नही कर पाएँगे…!!! NO ONE BELIEVE…!!!

कुलधरा गाँव के खंडहर
कुलधरा गाँव के खंडहर

कुलधरा के वीरान होने कि कहानी (Story of Kuldhara)
जो गाँव इतना विकसित था तो फिर क्या वजह रही कि वो गाँव रातों रात वीरान हो गया। इसकी वजह था गाँव   का अय्याश दीवान सालम सिंह जिसकी गन्दी नज़र गाँव कि एक खूबसूरत लड़की पर पड़ गयी थी। दीवान उस लड़की के पीछे इस कदर पागल था कि बस किसी तरह से उसे पा लेना चाहता था। उसने इसके लिए ब्राह्मणों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। हद तो तब हो गई कि जब सत्ता के मद में चूर उस दीवान ने लड़की के घर संदेश भिजवाया कि यदि अगले पूर्णमासी तक उसे लड़की नहीं मिली तो वह गांव पर हमला करके लड़की को उठा ले जाएगा। गांववालों के लिए यह मुश्किल की घड़ी थी। उन्हें या तो गांव बचाना था या फिर अपनी बेटी। इस विषय पर निर्णय लेने के लिए सभी 84 गांव वाले एक मंदिर पर इकट्ठा हो गए और पंचायतों ने फैसला किया कि कुछ भी हो जाए अपनी लड़की उस दीवान को नहीं देंगे।
फिर क्या था, गांव वालों ने गांव खाली करने का निर्णय कर लिया और रातोंरात सभी 84 गांव आंखों से ओझल हो गए। जाते-जाते उन्होंने श्राप दिया कि आज के बाद इन घरों में कोई नहीं बस पाएगा। आज भी वहां की हालत वैसी ही है जैसी उस रात थी जब लोग इसे छोड़ कर गए थे।

 

कुलधरा  मे पुराना मकान
कुलधरा मे पुराना मकान

आज भी है श्राप का असर:
पालीवाल ब्राह्मणों के श्राप का असर यहां आज भी देखा जा सकता है। जैसलमेर के स्थानीय निवासियों की मानें तो कुछ परिवारों ने इस जगह पर बसने की कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके। स्थानिय लोगों का तो यहां तक कहना है कि कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जो वहां गए जरूर लेकिन लौटकर नहीं आए। उनका क्या हुआ, वे कहां गए कोई नहीं जानता।

कुलधरा गाँव  (जैसलमेर) के अवशेष
कुलधरा गाँव (जैसलमेर) के अवशेष

यहां के धरती में दबा है सोना इसलिए आते हैं पर्यटक:
पर्यटक यहां इस चाह में आते हैं कि उन्हें यहां दबा हुआ सोना मिल जाए। इतिहासकारों के मुताबिक पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी संपत्ति जिसमें भारी मात्रा में सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात थे, उसे जमीन के अंदर दबा रखा था। यही वजह है कि जो कोई भी यहां आता है वह जगह-जगह खुदाई करने लग जाता है। इस उम्मीद से कि शायद वह सोना उनके हाथ लग जाए। यह गांव आज भी जगह-जगह से खुदा हुआ मिलता है।

कुलधरा गाँव मे एक प्राचीन मंदिर के अवशेष
कुलधरा गाँव मे एक प्राचीन मंदिर के अवशेष

पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कि कुलधरा में पड़ताल :-
मई 2013 मे दिल्ली से आई भूत प्रेत व आत्माओं पर रिसर्च करने वाली पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कुलधरा(Kuldhara) गांव में बिताई रात। टीम ने माना कि यहां कुछ न कुछ असामान्य जरूर है। टीम के एक सदस्य ने बताया कि विजिट के दौरान रात में कई बार मैंने महसूस किया कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, जब मुड़कर देखा तो वहां कोई नहीं था। पेरानॉर्मल सोसायटी के उपाध्यक्ष अंशुल शर्मा ने बताया था कि हमारे पास एक डिवाइस है जिसका नाम गोस्ट बॉक्स है। इसके माध्यम से हम ऐसी जगहों पर रहने वाली आत्माओं से सवाल पूछते हैं। कुलधरा में भी ऐसा ही किया जहां कुछ आवाजें आई तो कहीं असामान्य रूप से आत्माओं ने अपने नाम भी बताए। शनिवार चार मई की रात्रि में जो टीम कुलधरा गई थी उनकी गाडिय़ों पर बच्चों के हाथ के निशान मिले। टीम के सदस्य जब कुलधरा गांव में घूमकर वापस लौटे तो उनकी गाडिय़ों के कांच पर बच्चों के पंजे के निशान दिखाई दिए। (जैसा कि कुलधरा(Kuldhara) गई टीम के सदस्यों ने मीडिया को बताया )

Son Doong Cave – दुनिया की सबसे बड़ी गुफा (world’s biggest cave)

आज  हम आपको  ले चलते है वर्ल्ड की सबसे बड़ी गुफा की सेर पर, यह गुफा Vietnam के जंगलो के बिच में स्थित है। यह गुफाSon Doong के  नाम सबसे से जानी जाती है।

Inside in the Cave of Son Doong
Inside in the Cave of Son Doong

इस की खोज 1991 में हो खान नाम के एक आदमी ने की थी। लेकिन पानी की भयंकर गर्जना एवं अँधेरे के कारण किसी की भी गुफा के अंदर जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। इसलिए इस गुफा के अंदर की दुनिया इसकी खोज के 18 सालो तक यानि 2009 तक लोगो के लिए अनजान रही। सन 2009 में British Cave Research Association ने एक अभियान चलाकर इसके अंदर की झलक दुनिया को दिखलाई।
यह अभियान 10 से 14 अप्रैल 2009 के बिच चला था लेकिन उनका अभियान बिच में ही एक बहुत बड़ी दीवार के कारण रुक गया था। इस गुफा से निकासी का रास्ता 2010 में खोज गया जब एक दल ने उस 200 मीटर उची दीवार को पर किया।

है क्या ये..!!! आप कल्पना नही कर पाएँगे…!!! NO ONE BELIEVE…!!!Inside the cave of Son Doong

Inside the cave of Son Doong

उन्होंने पाया की यह गुफा Vietnam की पिछली सबसे बड़ी गुफा से 5 गुना तथा विश्व की तब तक की  सबसे बड़ी गुफा ,Malaysia की Deer Cave से 2 गुना बड़ी है। इस गुफा का कुछ हिस्सा उपर से टुटा हुआ है जहा एक छोटा सा जंगल है।  यह गुफा 5 . 5 मिल लम्बी है। इस पूरी गुफा में एक गर्जना करती हुई नदी बहती है। इस गुफा में 300 मिलियन साल पुराने जीवाश्म भी मिले है।

Rappelling into the cave of Son Doong
Rappelling into the cave of Son Doong

इस गुफा को इस साल पहली बार Tourists के लिए खोला गया औ एक Tour आयोजित किया गया जिसमे की 6 मेम्बर थे  जो की अब हर साल फरवरी से अगस्त के बिच में आयोजित किया जायेगा।  गुफा की सेफ्टी को ध्यान में रखते हुए Tourist  की संख्या बहुत कम रखी गयी है , 2014 के लिए केवल 220 Tourist की लिमिट है।

BIG WORLD OF FUNNY AND INTERESTING FACTS…!!! YOU AMAZED AFTER READING THIS.

Camping in the cave of Son Doong

Camping in the cave of Son Doong

फौलादी हौसलें कि कहानी – बिना हाथ पैरों के फतह कर ली 14 हजार फीट से अधिक ऊंची चोटी

है क्या ये..!!! आप कल्पना नही कर पाएँगे…!!! No one believe…!!!

Picture: Oliver Meckes/FEI/fei.com / Rex Features
Picture: Oliver Meckes/FEI/fei.com / Rex Features
आप कल्पना नही कर पाएँगे…की ये एक बहोत ही छोटा जीव मच्छर की आँख है…!!!
जिंदगी मे किसी ने इतने पास से और करीब से मच्छर की आँख नही देखी होगी…पर इसको आप एलेक्ट्रान माइक्रो स्कोप के ज़रिए देख सकते है…!!!एक बार ज़रुरू अपने मित्रो को ये पिक्चर दिखाए…!!!
वो भी यकीन नही कर पाएँगे…!!!
No one believe but this is the mosquito eyes.

No one really likes getting up close and personal with a mosquito. Expect when it is under an electron microscope. FEI provide this image using FEI Quanta Microscope.

Frontal view to the compound eyes of a mosquito. The surface of each single eye has a rough appearance which gives them a violet shimmer in real life. Between and above the eyes fine scales, similar to the ones at butterflies can be seen.

NEVER SEEN BEFORE IMAGE:


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फौलादी हौसलें कि कहानी – बिना हाथ पैरों के फतह कर ली 14 हजार फीट से अधिक ऊंची चोटी

कहते है कि अगर आपके हौसलें मजबूत हो इरादे फौलादी हो तो दुनिया कि कोई ताकत आपको अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से नहीं रोक सकती है। जेमी एंड्रयू ऐसे ही एक मजबूत हौसलें और फौलादी इरादो वाले व्यक्ति है।जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी जानकर कोई भी व्यक्ति हैरत में पड़ सकता है। 44 वर्षीय जेमी एंड्रयू ने जिस शौक के चलते आज से 15 साल पहले अपने हाथ-पैर गंवा दिए थे, उसी को पूरा करने के लिए 14,691.6 फीट (4,478 मीटर) ऊंची मैटरहॉर्न माउंटेन (माउंट सेरविने) को फतह किया है। खास बात है कि एंड्रयू जब पहले हाथ-पैर रहते हुए पर्वतारोहरण करते थे, तब भी उन्होंने इतनी ऊंचाई कभी नहीं चढ़ी थी।

जेमी एंड्रयू पर्वतारोहरण करते हुए
जेमी एंड्रयू पर्वतारोहरण करते हुए
जेमी एंड्रयू पर्वतारोहरण करते हुए
जेमी एंड्रयू पर्वतारोहरण करते हुए

एंड्रयू ने बिना हाथ और पैरों के स्विटजरलैंड के जेरमैट कस्बे के पास मैटरहॉर्न माउंटेन की चढ़ाई पूरी की है। स्कॉटलैंड की राजधानी ईडनबर्ग निवासी इस पर्वतारोही को उम्मीद है कि उनके इस साहसिक कारनामें से दूसरों को प्रेरणा मिलेगी। खासतौर, से उन लोगों को, जो शारीरिक रूप से विकलांग होने पर साहसिक कारनामे करने से डरते हैं।

44 वर्षीय जेमी एंड्रयू
44 वर्षीय जेमी एंड्रयू
44 वर्षीय जेमी एंड्रयू
44 वर्षीय जेमी एंड्रयू

यह अल्प्स पर्वत और यूरोप की सबसे ऊंची चोटी है। इस चोटी पर 1865 से पर्वतारोहरण की शुरुआत होने के बाद से अब तक करीब 500 से अधिक पर्वतारोहियों की मौत हो चुकी है। दो हाथ और दो पैर खोने के बाद अदम्य साहसी कारनामा करने वाले जेमी एंड्रयू पर आधारित स्टोरी चैनल-5 अगले माह से प्रसारित करेगा।

जेमी एंड्रयू: हौसलें कि कहानी
जेमी एंड्रयू: हौसलें कि कहानी
जेमी एंड्रयू और उनके दोस्त जेमी फिशर
जेमी एंड्रयू और उनके दोस्त जेमी फिशर

जेमी एंड्रयू और उनके दोस्त जेमी फिशर 15 साल पहले मोंट ब्लांक में 4000 मीटर ऊंची लेस ड्रोइट्स माउंटेन में बर्फीले तूफान में फंस गए थे। बर्फीली हवाएं 90 मील प्रति घंटे की गति से बह रहीं थीं। इस दौरान वह 4 दिन वहां फंसे रहे और फिशर की मौत हो गई।

जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी
जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी
जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी
जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी

हालांकि, बचाव दल एंड्रयू को वहां से निकाल लाया, लेकिन उनके हाथ-पैर ठंड से बुरी तरह से प्रभावित हुए। डॉक्टरों के पास उनके हाथ- काटने के अलावा कोई भी दूसरा विकल्प नहीं था। ऑपरेशन के बाद उन्होंने कृत्रिम हाथ-पैरों को अपनाया।

जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी
जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी
जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी
जेमी एंड्रयू की रियल स्टोरी

कुछ ही साल बाद एंड्रयू फिर पहाड़ों की ओर वापस आ गए। वह फिर से उस जगह जाना चाहते थे, जहां उनके दोस्त की मौत हुई थी। उन्होंने ईडनबर्ग की एक छोटी पहाड़ी पर चढऩे का अभ्यास करना शुरू किया। यूरोप की सबसे अधिक ऊंची चोटी पर चढऩे के कारनामा करने के दौरान मिशन में एंड्रयू के पार्टनर स्टीव जोंस रहे।

जेमी एंड्रयू : हौसलें कि कहानी
जेमी एंड्रयू : हौसलें कि कहानी

Images courtesy: http://www.dailymail.co.uk


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